1 स्टार आउट ऑफ 5
13 साल बाद आई अजय देवगन की फिल्म ‘सन ऑफ सरदार 2’ इस उम्मीद के साथ रिलीज़ हुई कि शायद यह पुरानी हिट फिल्म की यादें ताज़ा करेगी। लेकिन अफसोस, यह फिल्म दर्शकों के धैर्य की कड़ी परीक्षा लेती है। न तो कहानी में दम है, न संवादों में कोई असर, और न ही कॉमेडी में वो धार है, जो दर्शकों को गुदगुदा सके।
कहानी का कोई सिर-पैर नहीं
फिल्म की शुरुआत एक ढीली और बेजान पटकथा से होती है। जस्सी नाम का किरदार (अजय देवगन) पंजाब से लंदन जाता है, जहां उसकी बीवी (नीरू बाजवा) उसे तलाक और प्रॉपर्टी मांग कर चौंका देती है। इस बीच एक टेढ़ी-मेढ़ी कहानी शुरू होती है जिसमें राबिया (मृणाल ठाकुर), रवि किशन, चंकी पांडे, दीपक डोबरियाल, कुब्रा सैत और कई अन्य किरदार जोड़ दिए जाते हैं — पर क्यों? खुद निर्देशक को भी शायद इस बात की समझ नहीं रही।
अभिनय या टाइम पास?
अजय देवगन जैसे अनुभवी अभिनेता का प्रदर्शन इस फिल्म में इतना लचर है कि आप सोचने पर मजबूर हो जाते हैं — क्या उन्होंने स्क्रिप्ट पढ़कर फिल्म साइन की थी? मृणाल ठाकुर का किरदार कुछ देर के लिए ध्यान खींचता है, लेकिन संवाद इतने बेतुके हैं कि उनके अभिनय की मेहनत भी बेकार हो जाती है।
सबसे ज्यादा निराश दीपक डोबरियाल और संजय मिश्रा जैसे दमदार कलाकारों के साथ हुई नाइंसाफी से होती है। टैलेंट को इस तरह बेकार करना निर्देशक की अदूरदर्शिता का सबूत है।
निर्देशक की दिशाहीनता
विजय कुमार अरोड़ा, जो पंजाबी फिल्मों में एक बड़ा नाम माने जाते हैं, ने हिंदी में निर्देशन की शुरुआत तो की है लेकिन यहां वो पूरी तरह फेल साबित हुए हैं। फिल्म में ना तो कथानक है, ना कोई स्पष्ट उद्देश्य। कुछ किरदार ऐसे डाले गए हैं, जिनका फिल्म में कोई मतलब नहीं है। क्लाइमैक्स तक आते-आते दर्शक यह तय नहीं कर पाते कि फिल्म कॉमेडी है, ड्रामा है, या फिर कोई सोशल मैसेज देना चाहती है — क्योंकि शायद निर्देशक को भी नहीं पता।
संगीत: एक और विफल प्रयोग
फिल्म के गाने फिल्म को और बोझिल बना देते हैं। “पहला तू, दूजा तू…” जैसे गानों को देखकर ऐसा लगता है मानो किसी पुराने बोर पंजाबी एल्बम को रीमिक्स करके जबरदस्ती डाला गया हो। बैकग्राउंड आर्टिस्ट की भीड़ और खराब कोरियोग्राफी इस बात को और पुख्ता करती है कि फिल्म का संगीत विभाग भी सिर्फ खानापूरी के लिए बनाया गया है।
क्यों न देखें?
अगर आप फिल्मों में कहानी, प्रदर्शन, निर्देशन और मनोरंजन जैसे मूल तत्वों की उम्मीद करते हैं, तो ‘सन ऑफ सरदार 2’ से दूर रहें। यह फिल्म केवल उन लोगों के लिए है जो थिएटर में बैठकर दो घंटे मोबाइल चलाना चाहते हैं। यह ना केवल दर्शकों का समय बर्बाद करती है, बल्कि एक बेहतरीन कलाकारों की टीम को भी व्यर्थ करती है।
निष्कर्ष:
रेटिंग: ⭐ (1/5)
‘सन ऑफ सरदार 2’ एक ऐसी फिल्म है, जो शायद कभी नहीं बननी चाहिए थी। यह न केवल पुरानी फिल्म की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाती है, बल्कि दर्शकों की उम्मीदों पर भी पानी फेर देती है।