फिल्म को 5 में से 1 स्टार
जब किसी फिल्म को समाज के सबसे संवेदनशील मुद्दे को छूने का मौका मिले, तो उससे उम्मीद की जाती है कि वह दर्शकों को झकझोर दे। लेकिन ‘धड़क 2’ इस मोर्चे पर बुरी तरह फेल हो जाती है। तमिल क्लासिक ‘परियेरुम पेरुमल’ से प्रेरित यह फिल्म न तो उसकी गंभीरता को छू पाई, न ही उसका प्रभाव दोहरा सकी।
यह फिल्म बस दिखाने भर के लिए ‘समाजिक मुद्दे’ का टैग लगा लेती है, लेकिन उसकी आत्मा तक पहुंचने का प्रयास तक नहीं करती। यदि आपने ‘सैराट’ या ‘परियेरुम पेरुमल’ देखी है, तो ‘धड़क 2’ आपको बेहद सतही, थकी हुई और भावनात्मक रूप से खोखली लगेगी।
कहानी: एक बार फिर वही घिसा-पिटा ढांचा
कहानी है नीलेश की, जो एक दलित परिवार से आता है और वकील बनने का सपना देखता है। उसे ऊँची जाति की विधि से प्रेम हो जाता है। प्रेम और संघर्ष की ये कहानी, हमने न जाने कितनी बार देखी-सुनी है। मगर ‘धड़क 2’ इस क्लासिक कॉन्फ्लिक्ट को किसी नई दृष्टि या गंभीरता के साथ प्रस्तुत नहीं करती।
इस फिल्म में संघर्ष भी ‘साफ-सुथरे’ तरीके से दिखाया गया है, जैसे समाज में जातिवाद कोई भावनात्मक गहराई नहीं, सिर्फ स्क्रिप्ट का हिस्सा भर हो।
अभिनय: सिद्धांत ही एकमात्र राहत
सिद्धांत चतुर्वेदी का अभिनय सराहनीय है, लेकिन वह भी एक कमजोर स्क्रिप्ट का शिकार हो जाते हैं। उन्होंने कोशिश भरपूर की है, पर जब किरदार की ही गहराई अधूरी हो, तो कलाकार भी सीमित रह जाता है। तृप्ति डिमरी का किरदार अधपका है—शुरुआत में आत्मविश्वासी, फिर अचानक फीका पड़ता हुआ।
सौरभ सचदेवा को नफरत से भरी खामोशी के लिए तारीफ मिल सकती है, पर उनके सीन इतने कम हैं कि दर्शकों पर कोई स्थायी छाप नहीं छोड़ते।
निर्देशन: शाजिया इकबाल की नाकाम कोशिश
पहली बार निर्देशन कर रही शाजिया इकबाल के पास एक प्रभावशाली विषय था, लेकिन उनकी पकड़ उस पर बेहद कमजोर साबित हुई। फिल्म की शुरुआत बेहद सुस्त है, और जब तक कहानी रफ्तार पकड़ती है, दर्शक अपनी रुचि खो चुके होते हैं।
निर्देशकीय दृष्टिकोण साफ नहीं है—कभी लगता है कि वे जातिवाद पर बात करना चाहती हैं, तो कभी यह महज एक प्रेम कहानी बनकर रह जाती है। न ही फिल्म भावनात्मक रूप से आपको भीतर तक झकझोरती है, न ही मानसिक स्तर पर सोचने के लिए मजबूर करती है।
संगीत: गाना है पर याद नहीं रहता
फिल्म का म्यूजिक औसत से भी नीचे है। कोई गाना ऐसा नहीं है जिसे थिएटर से निकलने के बाद आप याद रखें। बैकग्राउंड स्कोर भी बिना जान का लगता है। न गहराई, न भावनात्मक बूस्ट।
कमजोरियां: सबकुछ अधूरा
जातिवाद जैसे विषय पर फिल्म बनाना काफी नहीं होता, उसे समझना और जिम्मेदारी से दिखाना जरूरी होता है।
किरदार सतही, कहानी दोहराई हुई और इमोशन फर्जी लगते हैं।
स्क्रिप्ट सामाजिक यथार्थ के प्रति संवेदनशील नहीं लगती—बल्कि लगता है जैसे यह एक औपचारिकता निभाई जा रही हो।
निर्देशन में स्पष्ट दृष्टि का अभाव और सिनेमैटिक असर की कमी।
निष्कर्ष: देखना समय की बर्बादी
धड़क 2 देखने के बाद एक ही बात कही जा सकती है—यह फिल्म न तो समाज के लिए कोई संदेश छोड़ती है, न ही सिनेमा प्रेमियों को संतुष्टि देती है। ये न तो ‘धड़क’ जैसी रोमांटिक अपील रखती है और न ही ‘सैराट’ जैसी सामाजिक चेतना।
रेटिंग: ★☆☆☆☆ (1/5)
अगर आप अपने कीमती समय और पैसे का बेहतर उपयोग करना चाहते हैं, तो यह फिल्म स्किप करना ही बेहतर होगा।