Prahaar Movie Review: राजकुमार राव की दमदार अदाकारी, 26/11 आतंकी हमले की कहानी को प्रोपेगेंडा बनाने से बचती है फिल्म, जानें कैसी है ‘प्रहार’

Prahaar: The Untold Story of Ujjwal Nikam Review Prahaar: The Untold Story of Ujjwal Nikam Review

फिल्म रिव्यू रेटिंग

3/5

रेटिंग: 3/5 स्टार्स

Ujjwal Nikam praises Rajkummar Rao in biopic 'Prahaar', says film captures his untold story

Prahaar: The Untold Story of Ujjwal Nikam Review: राजकुमार राव की फिल्म ‘प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्ज्वल निकम’ 26/11 मुंबई आतंकी हमले और इस मामले में सरकारी वकील उज्ज्वल निकम की भूमिका को पर्दे पर उतारती है। निर्देशक अविनाश अरुण की यह फिल्म आतंकवाद, अदालत में चली कानूनी लड़ाई और न्याय पाने की कोशिशों को सामने लाती है। फिल्म की खास बात यह है कि संवेदनशील विषय होने के बावजूद यह धर्म को आतंकवाद से जोड़ने वाले प्रचार से काफी हद तक बचती है। हालांकि, कहानी में कुछ ऐसी कमियां भी हैं, जो इसे और बेहतर बना सकती थीं।

प्रहार फिल्म की कहानी क्या है?

फिल्म की शुरुआत 12 मार्च 1993 के मुंबई बम धमाकों से जुड़े एक अदालती दृश्य से होती है। इसमें सरकारी वकील उज्ज्वल निकम के किरदार में राजकुमार राव नजर आते हैं। निकम इस बात से असंतुष्ट दिखाई देते हैं कि मुंबई में हुए आतंकी हमलों के पीछे मौजूद बड़े चेहरों को अब तक न्याय के कटघरे तक नहीं लाया जा सका है।

इसके बाद कहानी 26 नवंबर 2008 की उस भयावह रात की ओर बढ़ती है, जब पाकिस्तान से आए 10 आतंकियों ने मुंबई के कई प्रमुख स्थानों पर हमले किए। इन हमलों में बड़ी संख्या में निर्दोष लोगों की जान गई। आतंकियों ने छत्रपति शिवाजी टर्मिनस सहित कई जगहों पर अंधाधुंध गोलियां चलाईं और ग्रेनेड से हमले किए।

इन आतंकियों में अजमल आमिर कसाब एकमात्र ऐसा हमलावर था, जिसे जिंदा पकड़ा गया। इसके बाद उसके खिलाफ कानूनी प्रक्रिया शुरू हुई और उज्ज्वल निकम ने सरकारी पक्ष की ओर से मुकदमा लड़ा। फिल्म का मुख्य हिस्सा इसी मुकदमे, कसाब के बयानों में विरोधाभास और पाकिस्तान में आतंकियों को प्रशिक्षण दिए जाने से जुड़े पहलुओं पर केंद्रित है।

प्रोपेगेंडा बनने से खुद को बचाती है फिल्म

‘प्रहार’ की सबसे बड़ी खासियत इसका संवेदनशील विषय को संभालने का तरीका है। 26/11 जैसे आतंकी हमले पर फिल्म बनाते समय कहानी को धार्मिक या राजनीतिक प्रचार का माध्यम बनाने का जोखिम रहता है। लेकिन निर्देशक अविनाश अरुण इस जाल में फंसने से काफी हद तक बचते हैं।

फिल्म आतंकवाद के पीछे मौजूद संगठनों, आतंकियों की ट्रेनिंग और पाकिस्तान की भूमिका पर बात करती है, लेकिन अधिकांश समय पूरे समुदाय को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश नहीं करती। यही वजह है कि फिल्म अपनी कहानी के मूल उद्देश्य यानी आतंकवादी हमले और उसके बाद हुई न्यायिक लड़ाई पर ध्यान बनाए रखती है।

हालांकि, अदालत में एक जगह उज्ज्वल निकम और बचाव पक्ष के वकील अब्बास काजमी के बीच बहस के दौरान इस्तेमाल किए गए शब्द कहानी के संतुलन को थोड़ा प्रभावित करते हैं। इसके बावजूद फिल्म का समग्र दृष्टिकोण इसे सामान्य प्रचार आधारित फिल्मों से अलग खड़ा करता है।

निर्माता दिनेश विजान और निर्देशक अविनाश अरुण ने इस मामले को केवल भावनात्मक नारों के सहारे पेश करने के बजाय अदालत की कार्यवाही और कानूनी लड़ाई को भी अहमियत दी है। आज के दौर में इस तरह के विषय पर संतुलित फिल्म बनाना अपने आप में उल्लेखनीय है।

राजकुमार राव ने निभाया उज्ज्वल निकम का किरदार

When Kasab claimed to be 17: Rajkummar Rao's Prahaar trailer highlights 26/11 trial - India Today

राजकुमार राव फिल्म की सबसे बड़ी ताकत हैं। उन्होंने उज्ज्वल निकम के किरदार को आत्मविश्वास, गंभीरता और दृढ़ता के साथ निभाया है। अदालत में बहस करते हुए उनका अंदाज और मामले को लेकर उनकी प्रतिबद्धता किरदार को प्रभावशाली बनाती है।

राजकुमार इससे पहले फिल्म ‘शाहिद’ में वकील शाहिद आजमी की भूमिका निभा चुके हैं। उस फिल्म में उन्होंने आतंकवाद से जुड़े मामलों में फंसाए गए लोगों का बचाव करने वाले वकील की कहानी दिखाई थी। ‘प्रहार’ में उनका किरदार अलग है, लेकिन कानूनी प्रक्रिया और अदालत के दृश्यों में उनका अनुभव साफ दिखाई देता है।

राजकुमार की अदाकारी फिल्म को मजबूती देती है। वह अपने किरदार को केवल ऊंची आवाज में संवाद बोलने तक सीमित नहीं रखते, बल्कि कई दृश्यों में उनकी भाव-भंगिमाएं भी कहानी को आगे बढ़ाती हैं।

जयदीप अहलावत और ऋत्विक सहोरे ने भी छोड़ी छाप

'Prahaar' teaser out: Rajkummar Rao seamlessly transforms into Ujjwal Nikam

फिल्म में जयदीप अहलावत ने पाकिस्तान की संघीय जांच एजेंसी से जुड़े सरकारी वकील चौधरी जुल्फिकार का किरदार निभाया है। राजकुमार राव के साथ उनके दृश्य फिल्म के सबसे दिलचस्प हिस्सों में शामिल हैं। दोनों के बीच कानूनी बहस और बातचीत में एक अलग तरह की ऊर्जा दिखाई देती है।

जयदीप अपनी स्क्रीन प्रेजेंस और स्वाभाविक अभिनय से दृश्यों को प्रभावशाली बनाते हैं। वह राजकुमार राव के सामने भी अपनी अलग पहचान कायम रखते हैं।

वहीं, ऋत्विक सहोरे ने उज्ज्वल निकम के बेटे की भूमिका निभाई है। फिल्म में पिता और बेटे के बीच रिश्तों का तनाव कहानी को भावनात्मक आधार देता है। निकम अपने काम में इतने व्यस्त रहते हैं कि परिवार के लिए समय निकालना मुश्किल हो जाता है। उनका बेटा भी पिता के साथ काम करना चाहता है, लेकिन दोनों के बीच मतभेद बने रहते हैं।

ऋत्विक ने इस किरदार की नाराजगी, भावनात्मक उलझन और अपने पिता से जुड़ाव को अच्छी तरह पेश किया है।

कसाब के किरदार में ललित प्रभाकर का प्रभावशाली अभिनय

फिल्म में ललित प्रभाकर ने अजमल कसाब की भूमिका निभाई है। उनके किरदार के जरिए आतंकवादी की क्रूरता के साथ-साथ उसके बयानों और व्यवहार में दिखाई देने वाले विरोधाभासों को भी सामने लाया गया है।

एक तरफ कसाब निर्दोष लोगों पर गोलियां चलाता दिखाई देता है, वहीं दूसरी तरफ वह पुलिस को गुमराह करने और अपने अपराधों से इनकार करने की कोशिश करता है। फिल्म में उसके प्रशिक्षण, मानसिक स्थिति और अपनी मां को याद करते हुए पश्चाताप करने जैसे पहलुओं को भी जगह दी गई है।

ललित प्रभाकर ने इस भूमिका को निभाते समय किरदार के अलग-अलग रंगों को सामने लाने की कोशिश की है। छत्रपति शिवाजी टर्मिनस पर हुए नरसंहार के दृश्य विशेष रूप से विचलित करने वाले हैं। इन दृश्यों के जरिए फिल्म यह याद दिलाती है कि आतंकी हमले केवल आंकड़े नहीं होते, बल्कि उनके पीछे अनगिनत परिवारों की बर्बाद हुई जिंदगी होती है।

फिल्म में क्या कमी रह गई?

‘प्रहार’ कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर अच्छा काम करती है, लेकिन इसकी कहानी में कुछ कमियां भी हैं। फिल्म के नाम से उम्मीद होती है कि उज्ज्वल निकम के पूरे करियर, उनके चर्चित मुकदमों और सरकारी वकील के रूप में उनकी पहचान बनने की यात्रा को विस्तार से दिखाया जाएगा।

हालांकि, फिल्म अपेक्षाकृत जल्दी कसाब के मुकदमे पर पहुंच जाती है। इससे निकम के शुरुआती करियर और उनके व्यक्तित्व को आकार देने वाली घटनाओं के बारे में अधिक जानने की गुंजाइश कम रह जाती है।

उनके पारिवारिक जीवन को कहानी में शामिल किया गया है, लेकिन कई जगह यह हिस्सा मुख्य घटनाक्रम के साथ पूरी तरह जुड़ता हुआ महसूस नहीं होता। निकम को एक बेहद दृढ़ और न्याय के लिए किसी भी हद तक जाने वाले वकील के रूप में दिखाया गया है। इससे उनका किरदार प्रभावशाली तो बनता है, लेकिन कुछ दृश्यों में उनकी छवि जरूरत से ज्यादा आदर्शवादी लग सकती है।

फिल्म की एक बड़ी कमी 26/11 हमले के दौरान एएसआई तुकाराम ओंबले की बहादुरी को पर्याप्त जगह नहीं देना है। ओंबले ने अपनी जान की परवाह किए बिना कसाब को पकड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उनके साहस और बलिदान को दिखाने वाला एक छोटा-सा दृश्य फिल्म को और प्रभावशाली बना सकता था।

क्या ‘प्रहार’ देखनी चाहिए?

‘प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्ज्वल निकम’ एक गंभीर विषय पर बनी ऐसी फिल्म है, जो अदालत की लड़ाई, आतंकवाद और न्याय की प्रक्रिया को पर्दे पर उतारने की कोशिश करती है। राजकुमार राव, जयदीप अहलावत और ऋत्विक सहोरे का अभिनय इसे मजबूती देता है। वहीं, अविनाश अरुण का निर्देशन फिल्म को अनावश्यक राजनीतिक और धार्मिक प्रचार से बचाए रखने में काफी हद तक सफल रहता है।

हालांकि, उज्ज्वल निकम के जीवन और करियर को विस्तार से न दिखाना तथा तुकाराम ओंबले के बलिदान को पर्याप्त जगह न देना इसकी कमियां हैं। कुछ हिस्सों में कहानी को अधिक संतुलित और गहराई से पेश किया जा सकता था।

इसके बावजूद, 26/11 हमले और उसके बाद चली कानूनी लड़ाई में रुचि रखने वाले दर्शकों के लिए यह फिल्म देखने लायक है।

किसके लिए: गंभीर सिनेमा, कोर्टरूम ड्रामा और वास्तविक घटनाओं पर आधारित फिल्में पसंद करने वाले दर्शकों के लिए।