Nikita Roy Movie Review: भारी भरकम थीम, कमजोर स्क्रीनप्ले, ‘निकिता रॉय’ नहीं आई पसंद | 1/5 स्टार

Nikita Roy Nikita Roy

हमारी रेटिंग: ⭐ (1/5)
देखें या न देखें: अगर आप हॉरर, थ्रिलर और सामाजिक संदेश से भरपूर सिनेमा की तलाश में हैं, तो यह फिल्म आपकी लिस्ट से बाहर ही रखिए।

सोनाक्षी सिन्हा, अर्जुन रामपाल और परेश रावल जैसे कलाकारों की मौजूदगी के बावजूद ‘निकिता रॉय’ दर्शकों को बांधने में नाकाम रही। एक गंभीर विषय को लेकर बनी इस फिल्म ने न तो डर पैदा किया, न ही सवाल उठाए — बल्कि दर्शकों को बोरियत और भ्रम में डाल दिया।

फिल्म की कहानी: इरादा अच्छा, निष्पादन कमजोर

‘निकिता रॉय’ की कहानी एक लेखिका के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अंधविश्वास के खिलाफ अपनी लड़ाई खुद लड़ती है। लेकिन जहां विषय में ताकत थी, वहीं लेखन और निर्देशन ने इसे कमज़ोर कर दिया। पात्रों की सोच और घटनाएं न तो विश्वसनीय लगती हैं, न ही असर छोड़ती हैं। कथानक बार-बार ट्रैक से भटकता है और दर्शक खुद को एक उलझे हुए चक्रव्यूह में फंसा हुआ पाता है।

अभिनय: न थ्रिल, न रियल

सोनाक्षी सिन्हा ने अपने किरदार में गंभीरता लाने की कोशिश की, लेकिन वो किरदार की गहराई तक पहुंच नहीं पाईं। खासकर हॉरर और सस्पेंस वाले दृश्यों में उनकी भाव-भंगिमा कृत्रिम लगती है। अर्जुन रामपाल एक साइडलाइन रोल में हैं और उनके पास कुछ खास करने को नहीं था। परेश रावल, जो हमेशा अपने अभिनय से जान डालते हैं, इस बार एक ढोंगी बाबा के रोल में भी अपनी छाप छोड़ने में चूक गए।

निर्देशन और तकनीकी पक्ष: डेब्यू की कमजोरी साफ दिखी

यह फिल्म कुश सिन्हा का डायरेक्टोरियल डेब्यू है, और यह डेब्यू औसत से भी नीचे निकल गया। कहानी की प्रस्तुति में निरंतरता की कमी है और सिनेमैटोग्राफी में नयापन नहीं दिखता। डर पैदा करने वाले दृश्यों में कैमरा वर्क और बैकग्राउंड स्कोर बहुत हल्के साबित हुए। नतीजतन, फिल्म अपने जेनर – हॉरर-ड्रामा – में भी असफल रही।

जनता का रिएक्शन: थिएटर से बाहर आते ही सोशल मीडिया पर फूटा गुस्सा

फिल्म देखने के बाद ज्यादातर दर्शकों ने इसे “समय और पैसे की बर्बादी” बताया। ट्विटर और इंस्टाग्राम पर लोगों ने इसे “मजबूरी में पूरी की गई फिल्म” और “बिना सिर-पैर की कहानी” करार दिया है। कई लोगों ने स्क्रीनप्ले की धीमी गति और क्लाइमेक्स की उलझन भरी संरचना पर भी नाखुशी जताई। एक यूजर ने कहा, “ये फिल्म न डराती है, न सिखाती है — बस थकाती है।”

निष्कर्ष: न दर्शकों को डरा पाई, न सोचने पर मजबूर कर पाई

‘निकिता रॉय’ में वो सबकुछ था जो एक दमदार फिल्म बना सकता था — बड़ा कास्ट, गंभीर मुद्दा, और एक सामाजिक संदेश। लेकिन सब कुछ सिर्फ कागज़ पर ही अच्छा रहा। असलियत में फिल्म एक खींची हुई, उलझी और प्रभावहीन प्रस्तुति बनकर रह गई।