भारतीय टेलीविजन और फिल्म इंडस्ट्री में अपने अभिनय और निर्देशन के जरिए अलग पहचान बनाने वाले दिग्गज धीरज कुमार अब हमारे बीच नहीं रहे। 79 वर्ष की उम्र में उन्होंने अंतिम सांस ली। वे एक ऐसे शख्स थे, जिन्होंने छोटे पर्दे पर भारतीय संस्कृति, धर्म और आदर्शों को जीवंत किया। उनके निधन से टेलीविजन की दुनिया में शोक की लहर दौड़ गई है।
पटना से मुंबई तक का संघर्षमय सफर
धीरज कुमार का जन्म 1 अक्टूबर 1944 को बिहार की राजधानी पटना में हुआ था। एक मध्यमवर्गीय परिवार से आने वाले धीरज बचपन में पोलियो का शिकार हो गए थे। पैरों में कमजोरी उनके जीवन का हिस्सा बनी, लेकिन इस कमजोरी को उन्होंने कभी भी अपनी कला और हौसले के आड़े नहीं आने दिया। बचपन से ही वे कला, सिनेमा और अभिनय की दुनिया में कुछ बड़ा करना चाहते थे, और यही जुनून उन्हें मुंबई खींच लाया।
फिल्मों में अभिनेता के तौर पर आगाज
वर्ष 1965 में एक प्रतिष्ठित टैलेंट हंट प्रतियोगिता ने उनके जीवन को दिशा दी। उसी दौर में राजेश खन्ना और सुबाष घई जैसे नाम भी उभरे। धीरज कुमार ने “दीदार”, “हीरा पन्ना”, “रातों का राजा” और “रोटी कपड़ा और मकान” जैसी कई फिल्मों में अभिनय किया। उनकी उपस्थिति भले ही ज्यादा लंबी नहीं रही, लेकिन जिस गहराई से वे हर किरदार में ढलते थे, वो उन्हें खास बनाती थी।
छोटे पर्दे पर धार्मिक क्रांति
फिल्मों से आगे धीरज कुमार ने अपना ध्यान टेलीविजन पर केंद्रित किया और ‘क्रिएटिव आई लिमिटेड’ नामक प्रोडक्शन कंपनी की स्थापना की। इसी बैनर तले उन्होंने भारतीय टेलीविजन इतिहास के सबसे प्रभावशाली धार्मिक धारावाहिकों में से एक “ओम नमः शिवाय” का निर्माण और निर्देशन किया। इस धारावाहिक को बनाने में नौ वर्षों का गहन शोध लगा था। भगवान शिव के इस किरदार को समर जय सिंह ने निभाया था। यह धारावाहिक 90 के दशक में घर-घर पूजा जैसा दर्जा प्राप्त कर चुका था और इसकी लोकप्रियता का आलम यह था कि इसे 2020 में एक बार फिर टीवी पर प्रसारित किया गया।
इसके अलावा “श्री गणेश”, “जय संतोषी माँ”, और “विष्णु पुराण” जैसे धार्मिक धारावाहिकों में भी उनका नाम जुड़ा रहा, जिन्होंने भारतीय पारिवारिक दर्शकों के बीच एक गहरी छाप छोड़ी।
सम्मान और विरासत
अपने अद्भुत योगदान के लिए उन्हें कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। धीरज कुमार को भारतीय टेलीविजन का ‘धार्मिक चित्रकला का शिल्पकार’ भी कहा जाता है। उनके धारावाहिक न सिर्फ मनोरंजन करते थे बल्कि लोगों के जीवन में नैतिक शिक्षा और संस्कार भरते थे।
अब यादें ही शेष
धीरज कुमार का जाना एक युग के अंत जैसा है। उन्होंने न केवल धर्म और संस्कृति को पर्दे पर पुनः स्थापित किया, बल्कि यह भी दिखाया कि जीवन में शारीरिक सीमाएं नहीं, मानसिक साहस मायने रखता है।
आज जब टेलीविजन की दुनिया में तकनीक और तड़क-भड़क हावी हो रही है, धीरज कुमार जैसे कलाकारों की सरलता और समर्पण की यादें और भी कीमती हो जाती हैं।