Shabana Azmi Religious Beliefs: दिग्गज अभिनेत्री शबाना आजमी ने धर्म, आस्था और अपनी मुस्लिम पहचान को लेकर खुलकर बात की है। 76 वर्षीय अभिनेत्री ने कहा कि वह खुद को मुस्लिम मानती हैं और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी हुई हैं, लेकिन उनका धर्म के साथ कोई औपचारिक या धार्मिक जुड़ाव नहीं है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वह नमाज नहीं पढ़ती हैं और उनके लिए आस्था पूरी तरह निजी मामला है। शबाना ने कहा कि राज्य को किसी व्यक्ति के धार्मिक विश्वास या प्रार्थना के मामले में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
एक बातचीत के दौरान शबाना आजमी ने अपने बचपन और परिवार के माहौल का जिक्र करते हुए बताया कि उनके पिता मशहूर शायर, गीतकार और लेखक कैफी आजमी नास्तिक थे। वहीं उनकी मां धर्म का पालन कभी-कभार करती थीं, लेकिन वह भी इसे लेकर बहुत गंभीर नहीं थीं। इसी पारिवारिक माहौल का असर शबाना की सोच पर भी पड़ा।
आईआईएमयूएन के यूट्यूब चैनल पर साझा की गई बातचीत में शबाना ने बताया कि वह बातचीत के दौरान कभी-कभी ‘माशाअल्लाह’ या ‘इंशाअल्लाह’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करती हैं। उनके पति और मशहूर लेखक-गीतकार जावेद अख्तर इस पर उनसे सवाल भी करते हैं। शबाना के मुताबिक, जावेद उनसे कहते हैं कि अगर कोई व्यक्ति हर बात में ‘प्रभु जी की मर्जी’ कहे तो उन्हें कैसा लगेगा। हालांकि, अभिनेत्री का कहना है कि उनके लिए ऐसे शब्द उनकी भाषा और सांस्कृतिक माहौल का हिस्सा हैं।
मुस्लिम पहचान से इनकार नहीं, लेकिन धार्मिक तौर-तरीकों से दूरी
शबाना आजमी ने अपनी मुस्लिम पहचान को लेकर कहा कि वह मुस्लिम हैं और उन्हें ईद का त्योहार पसंद है। उन्हें उर्दू भाषा, खान-पान और उससे जुड़ी सांस्कृतिक परंपराएं भी पसंद हैं। हालांकि, उन्होंने साफ किया कि उनके परिवार में नमाज पढ़ने की परंपरा नहीं है और धर्म के साथ उनका कोई औपचारिक जुड़ाव नहीं है।
अभिनेत्री की इस बात से यह स्पष्ट होता है कि वह अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को अलग-अलग नजरिए से देखती हैं। उनके लिए मुस्लिम होना केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें भाषा, संस्कृति, त्योहार और पारिवारिक विरासत भी शामिल हैं।
जावेद अख्तर से अलग है आस्था को लेकर नजरिया
शबाना आजमी ने अपने पति जावेद अख्तर की विचारधारा का भी जिक्र किया। उन्होंने जावेद को कट्टर नास्तिक बताया और कहा कि दोनों के विचार कई मामलों में अलग हैं। इसके बावजूद शबाना का मानना है कि किसी व्यक्ति की आस्था या नास्तिकता उसका निजी विषय होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि भगवान की अवधारणा उनके लिए ऐसी चीज नहीं रही जिससे उन्हें लगातार जूझना पड़ा हो। उनके मुताबिक, अगर किसी व्यक्ति को प्रार्थना करने के बाद अच्छा महसूस होता है तो उन्हें इससे कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन वह यह भी मानती हैं कि धार्मिक आस्था को निजी दायरे में ही रहना चाहिए और राज्य को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
शबाना ने धर्म और शासन के रिश्ते पर अपनी राय रखते हुए कहा कि किसी व्यक्ति का ईश्वर में विश्वास करना या न करना निजी मामला है। उनके अनुसार, सरकार या राज्य को यह तय करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए कि लोगों को किस तरह अपनी आस्था का पालन करना चाहिए।
‘यह हिंदू-मुस्लिम की लड़ाई नहीं, उदारवादी और असहिष्णु लोगों के बीच संघर्ष है’
बातचीत के दौरान शबाना आजमी ने समाज में धार्मिक असहिष्णुता को लेकर भी अपनी चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि वह और जावेद अख्तर दोनों ही कई बार अलग-अलग तरह की आलोचनाओं का सामना करते हैं। उनके मुताबिक, एक तरफ कट्टरपंथी मुस्लिम समूहों की ओर से फतवे जैसी बातें सामने आती हैं, तो दूसरी तरफ उन्हें दूसरे पक्ष से भी आरोपों और विरोध का सामना करना पड़ता है।
शबाना का मानना है कि इस तरह के विवाद को केवल हिंदू और मुस्लिम के बीच संघर्ष के रूप में देखना सही नहीं है। उन्होंने इसे उदारवादी और असहिष्णु विचारधारा के बीच की लड़ाई बताया। उनके अनुसार, उदारवादी हिंदू और उदारवादी मुस्लिम कई मुद्दों पर एक-दूसरे के साथ खड़े हो सकते हैं।
अभिनेत्री ने यह भी कहा कि जब हर मुद्दे को हिंदू-मुस्लिम के चश्मे से देखा जाता है तो इससे समाज में विभाजन बढ़ता है। उनके मुताबिक, धार्मिक पहचान का इस्तेमाल लोगों को बांटने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। वह मानती हैं कि असल चुनौती उन विचारों से है जो दूसरे व्यक्ति की स्वतंत्रता और अलग राय को स्वीकार नहीं करते।
कैफी आजमी के घर में हुई परवरिश
शबाना आजमी का जन्म मशहूर उर्दू शायर और गीतकार कैफी आजमी तथा थिएटर और फिल्म अभिनेत्री शौकत कैफी के परिवार में हुआ। कला और साहित्य से जुड़े माहौल में पली-बढ़ीं शबाना ने आगे चलकर भारतीय सिनेमा में अपनी अलग पहचान बनाई।
उनके पिता कैफी आजमी की विचारधारा और साहित्यिक पृष्ठभूमि का उनके व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव रहा। शबाना ने अपने फिल्मी करियर में कई गंभीर और सामाजिक मुद्दों से जुड़ी फिल्मों में काम किया। समानता, सामाजिक न्याय और व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे विषय उनके सार्वजनिक विचारों में भी अक्सर दिखाई देते हैं।
‘बटवारा 1947’ में नजर आईं शबाना
काम के मोर्चे पर शबाना आजमी हाल ही में निर्देशक राजकुमार संतोषी की पीरियड ड्रामा फिल्म ‘बटवारा 1947’ में नजर आई थीं। यह फिल्म 1947 के भारत-पाकिस्तान विभाजन की पृष्ठभूमि पर आधारित है। फिल्म की कहानी असगर वजाहत के 1989 के चर्चित नाटक ‘जिस लाहौर नई वेख्या, ओ जम्या ई नई’ से जुड़ी है।
‘बटवारा 1947’ में शबाना आजमी के अलावा सनी देओल, प्रीति जिंटा, करण देओल, कनिका कपूर, अली फजल, ईशा संधीर और अभिमन्यु सिंह जैसे कलाकार भी अहम भूमिकाओं में नजर आए। फिल्म 14 अगस्त 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज हुई थी।
शबाना आजमी का ताजा बयान एक बार फिर इस बात को सामने लाता है कि धार्मिक पहचान और व्यक्तिगत आस्था को लेकर हर व्यक्ति का नजरिया अलग हो सकता है। अभिनेत्री ने अपनी मुस्लिम सांस्कृतिक पहचान को स्वीकार करते हुए धार्मिक अनुष्ठानों से दूरी की बात कही है। साथ ही उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि किसी भी व्यक्ति की आस्था, नास्तिकता या प्रार्थना का फैसला उसके निजी जीवन का हिस्सा होना चाहिए।